मानसिंह अगर नही होते तो आज एक भी हिन्दू, हिन्दू नही होता ।

Raja Mansinghji Kacchwah Amer jaipur India ( Born 21 Dec.1550 – Died 6 july 1614 – 63 years )
पिता का नाम – आमेर नरेश भगवानदास कच्छवाह
माता का नाम – राजमाता भगवतीबाई
उत्तराधिकारी – राजा जगतसिंह
संतान – राजाभाऊ सिंह, कुंवर जगत सिंह, कुंवर दुर्जन सिंह, कुंवर हिम्मत सिंह, भोगदा सिंह, राजकुँवारी मैना बाईसा , मनोरमा बाई



माई एडो पूत जण, जेडो मान मर्द
समंदर खांडो पखारियो, काबुल पाड़ी हद ।। 

अर्थात :- कच्छवाहो ने समंदर पहली बार देखा था, ओर वहीं अपनी रक्त से भीगी तलवारे धोयीं । माता आपको धन्य है, जिन्होंने मानसिंहजी जैसा पुत्र पैदा किया ।। राजा मानसिंहजी की माता का नाम रानी भगवती बाई थी, ओर पिता का नाम श्रीभगवानदास जी था ।।

इतना ही नही, हम आपको बताएंगे कि किस तरह आज भी अफगानिस्तान के बच्चे मानसिंहजी के नाम से डर के सो जाते है, ओर हमारे यहां कवियों ने दोहे बना दिये :-

मात सुलावे बालकां , ख़ौफ़नाक रणगाथ
काबुल भूली नह अजे, यो खांडो ये हाथ

इस तरह का यह महान वीर एक महान कवि भी था ।

सिद्धि श्री मानसिंहजी की कीर्ति विरुद्ध
मई तो लो लाज रहो जो लो भूमि चिर बेनी है ।।
राबरी कुशल हम सिसुन है, समेत चाहे धरी धरी
पलपल युहाउ सुचेनि है, 
हुंडी एक तुमपे कही है, हजार को सो कविन
को राखो मानसिंहः जोग देनी है ।
पोहिए प्रमाण मानवंश में सपूत मान
रोक दीनी देन जसा लेते लिख लेनी है —

Translate – May the shreeman sinh , who the endowed with the fame and celebrity endure till the end of the world . I wish your well being as well as the well being your children every movement . Here too there is well being all the time . I send the cheque of rupee’s one thousand into you . Do please preserve the dignity of the poet , which action is worthy scion of your dynasty . One need only write to you ,you bestow, countless fortunes of people peremptorily and earn great celebrity there by .

गुरु नारायणदास श्रीराम संपर्क सूत्र – 8949314540

इसपर मानसिंहजी ने बड़ा ही रोचक जवाब तो दिया, लेकिन दिया एक कवि के अंदाज में –

इतमे हम महाराज है, उत्ते आप कविराज
हुंडी लिखत हजार की, लिखत ना आई लाज ??

की जैसे हम महाराज है, हमारे आप कवियों के राजा है । हम दोनों ही अपने अपने राजा है, फिर एक राजा दूसरे राजा से मात्र 1000 रुपये मांगता है , इतनी छोटी राशि मांगते हुए कविराज को लज्जा नही आई ?

इतना कहकर मानसिंहजी ने एक करोड़ रुपया कवियों को दिया ।। तब कविओ के झुंड ने मानसिंहजी के लिए कहा –

रक्त की नदियां बहाने वाला, जो हमेशा युद्धरत रहता है, वह इतना दानी भी है , संसार मे आपका इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा महाराज । आप स्वयं साधारण मनुष्य नही, गौरी की गोद मे बैठे, साक्षात गणेश ही है ।।

आपने आजतक रक्त रंजित इतिहास ही पढ़ा होगा, लेकिन राजाओ के द्वारा किये गए कार्यकाल में अद्भुत विकाश की छवियां आपने नही देखी होगी, ओर यह विकाश भी तब है, जब केंद्र में अकबर जैसे धर्मान्ध कट्टर इस्लामी शासक का शासन हो । मानसिंहजी के काल मे एक भी मंदिर नही टूटा, जो मंदिर तोड़ दिए गए थे, उनका पुनरुद्धार हुआ, जिसमे से एक भगवान राम का मंदिर भी था ।

Bangal – Bihar border का “मानभूम ” मानसिंह ने ही बसाया था, ओर वह वर्तमान में भी मानसिंहजी के नाम पर ही है ।

मानसिंहजी ने अपने कार्यकाल में यहां बहुत विकाश किया था, लेकिन मुगल सत्ता औरंगजेब के हाथ मे आ जाने और आजादी के समय बिहार बंगाल में जातीय हिंसा और मंदिरों के विध्वंस की घटनाओं के कारण आज यहां मानसिंहजी के इतिहास के रूप के केवल वहां का नाम स्मृति के तौर पर शेष है ।

मानसागर का निर्माण

आमेर का खूबसूरत मानसागर लेक मानसिंहजी कच्छवाह द्वारा उनकी मृत्यु के चार वर्ष पूर्व 1610 ईस्वी में बनाया गया । यह तात्कालीन समय मे जल के संकट को दूर करने के लिए था । जयपुर रियासत उस समय सबसे समृद्ध रियासत थी ।

शिलामाता के मंदिर का निर्माण ( 1604 ईस्वी बंगाल के कार्यकाल के दौरान )

माता शिलादेवी के इस मंदिर का निर्माण आमेर किले में ही 1604ईस्वी में हुआ । उस समय मानसिंहजी jessore ( वर्तमान बांग्लादेश ) में थे । कहते है देवी के आदेश पर मानसिंहजी के इस मंदिर का निर्माण मात्र 6 दिनों में करवाया था ।

बनारस के घाटों का निर्माण

काशी के घाटों की देखभाल हालांकि वर्तमान की सरकारें भी करती है, लेकिन बनारस काशी के घाटों का सर्वप्रथम निर्माण मानसिंहजी आमेर ने ही करवाया था ।

बनारस के भव्य मानमंदिर का निर्माण मानसिंहजी के करवाया था ।

मानमंदिर की दीवारों की कारीगरी दुनिया के सभी अजूबों को मात देती है ।
यह मानमंदिर मुख्यता भगवान भोलेनाथ को समर्पित है ।

पुष्कर का मानमहल मानसिंहजी द्वारा निर्मित

पुष्कर का यह मानमहल मानसिंहजी का गेस्ट हाउस था, जिसका निर्माण उन्होंने स्वयं अपने लिए करवाया था।

गोविंददेवजी के मंदिरों का निर्माण

वृंदावन के गोविन्ददेव जी का निर्माण मानसिंहजी के ही करवाया था , इनके बाद जयपुर में गोविन्ददेव जी के मंदिर का निर्माण ही सवाई जयसिंहजी ने करवाया

जगतशिरोमणि मंदिर आमेर

जयपुर आमेर का यह जगतशिरोमणि मंदिर मानसिंह जी ने अपने पुत्र के नाम पर रखा था, यह मुख्यतः भगवान विष्णु और भक्त मीरा को समर्पित मंदिर है ।

हरिद्वार, पटना ओर मथुरा के घाटों का निर्माण

हरिद्वार का पुराना नाम मायापुरी था, आधुनिक हरिद्वार मानसिंहजी ने ही बसाया था, हरिद्वार में श्रद्धालुओं के गंगा स्नान हेतु पोड़ियो का निर्माण किया गया है, इन पोड़ियो का निर्माण ईसा की पहली सदी में विक्रमादित्य ने किया था, ओर उसके बाद 1500 साल बाद यह कार्य मानसिंहजी कच्छवाह ने करवाया ।

मानसिंह एक प्रतापी राजा ही नही, महान दानी राजा थे, जैसे कोई चतुर्भुज कब अवतार हो, दो हाथों से युद्ध करना, ओर शेष दो हाथों से दान करना, यह कला जयपुर नरेश मानसिंहजी कच्छवाहा में थी । महाराज मानसिंहः जी आमेर महाधर्नुधर दिग्विजयी राजा थे । उनके स्मृतिचिन्ह इस संसार मे चिरकाल तक बने रहेंगे । दान, दासा, नरु, किशना, हरपाल, ईश्वरदास जैसे कवियों को उन्होंने एक एक करोड़ रुपया उस समय दान दिया था ।। उनके काल मे छापा चारण जैसे उनके दास 100-100 हाथियों के स्वामी हो गए थे । मान के गौदान की सम्पूर्ण संख्या 1 लाख थी ।।

मानसिंहजी जी की अकबर से प्रथम भेंट

अकबर मानसिंहजी से पूछा, मानसिंह, जब खुदा नूर ( शक्ल सूरत, सुंदर रंग) बांट रहे थे, तब आप कहाँ थे ? मानसिंहःजी ने जवाब दिया – श्रीमान अकबर, मैं भी वहीं था जिस समय सभी लोग सुंदरता बटोर रहे थे, मैं उस समय ईश्वर से वीरता और पराक्रम मांग रहा था । इसी बात से अकबर बहुत प्रभावित हुआ था, ओर मानसिंहजी को अपने साथ ले गया ।

आमेर रियासत ओर अकबर के बीच संधि के कारण

कच्छवाहो की राजनीति भारत की सभी रियासतों से हटकर राजनीति थी, जहां से ओर अन्य रियासतों के लिए मुगल परेशानी का सबब बने हुए थे, तो वहीं दूसरी ओर कच्छवाह पठानों को हिन्दुत्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे, ओर यह कहीं ना कहीं सही भी था । कासिम के बाद जितने आक्रमण हुए, चाहे वह मूहम्मद गजनवी का करोड़ो हिंदुओ की हत्या कर 17 बार सोमनाथ समेत भारत को लूटना हो, या गजनवी के पिता सुबुक्तगीन द्वारा राजा जयपाल से अफगानिस्तान हड़पना हो । इन्ही पठानों के कारण भाटी जैसे वीर राजपूतो को अफगानिस्तान छोड़कर जैसलमेर आना पड़ा था । उसके बाद चाहे सालार मसूद गजनी हो, जिसके बारे में कहा जाता है की वह जहां से गुजरता था, हवाएं भी इस्लाम कबूल कर लेती थी, इसका अर्थ उसकी क्रुरता से लगाना उचित होगा, क्यो की वह जहां से भी गुजरता था, अपने क्रूरतम तरीके से वहां की पूरी आबादी को तलवार की नोक पर इस्लाम की दीक्षा देता हुआ चलता था। इसी सालार गजनी का वध बहराइच के राजा सुहेलदेव बैंस जी ने किया था । उसके बाद हम नजर डालें तो मूहम्मद गौरी भी एक पठान ही था , जिसके बाद गुलामवंश चला, कुतबुद्दीन ऐबक से लेकर नालंदा को जलाने वाला बख्तियार खिलजी पठान ही था, राणा रत्नंसिंह के समय चितोड़ का विध्वंस करने वाला अलाउद्दीन खिलजी भी पठान ही था, इस नरपिशाच के काल मे महारानी पद्मावती समेत 20,000 राजपूत स्त्रियो का जौहर हुआ था। मुगलो के आने से पहले पठानों ने भारत को पूरी तरह जकड़ लिया था । बिहार के सुल्तान, मालवा के सुल्तान , नागौर के सुल्तान यहां तक कि चित्तौड़ तक एक समय पठानों का कब्जा हो चुका था । यह पठान केवल हिंदुओ के शत्रु नही थे, दिल्ली की तख्त पर बैठा गैरपठान राजा भी इनका उतना ही बड़ा शत्रु था, आप इतिहास में देख सकते है, मुगल हिमायूँ से लड़ने वाला शेरशाह सूरी पठान ही था, ओर उसने अफगानिस्तान के पठानों से मदद लेने के लिए ही पेशावर से लकेर बिहार तक कि सड़क के मरम्मत का कार्य करवाया था । बाबर मुगल ने जिस मुस्लिम बादशाह का सिर धड़ से अलग कर भारत मे प्रवेश किया था, वह इब्राहिम लोदी भी पठान था। अतः इतिहास के पाठकों को यह समझना चाहिए की केवल हिंदुओ ओर मुसलमानो का नही, मुसलमानो का भी भारत की सत्ता के लिए आपसी अंतरयुद्ध चला है , मुगलो ओर पठानों का आपसी बैर इसका उदाहरण है ।।यह बात 1543 ईस्वी की है, जब शेरशाह सूरी मारवाड़ के राजा मालदेव को परास्त करने पूरी शक्ति से मारवाड़ की ओर बढ़ रहा था। मालदेव को बुरी तरह रौंदने शेरशाह सूरी विशाल टिड्डी दल के साथ मारवाड़ की ओर बढ़ रहा था। आमेर के सामने एक चिंता और भी थी, की अगर कहीं शेरशाह की सेना बीकानेर की तरफ बढ़ गयी, तो उस पूरे क्षेत्र का इस्लामीकरण होने से फिर कोई नही रोक सकता, क्यो की बीकानेर उस समय इतनी आबादी वाला क्षेत्र नही था, ओर युद्ध के पूरे संसाधन भी वहां नही थे, वहां नजर आजादी के समय बाद महाराजा गंगासिंहः जी अब लेकर आए है, वहां पानी की कितनी बड़ी समश्या उस समय थी । आमेर के गोपाल जी शेरशाह सूरी को रोकने के लिए चाटसू की ओर आगे बढ़े, आमेर के कच्छवाह योद्धाओं की संख्या शेरशाह के सैनिकों की तुलना में काफी ज्यादा कम थी, लेकिन कच्छवाहो ने शेरशाह की सेना का चारो तरफ से घेरकर उसका बड़ी बुरी तरह संघार किया । कच्छवाहो ने बिहारी मुसलमानो से सुसज्जित 4 -4 फुट के मुसलमानो की सेना को गाजर मूली की तरह इस तरह बधारा की शेरशाह मैदान छोड़कर भाग गया । आमेर के ऊपर से संकट टला सो टला, शेरशाह के इस नुकसान के बाद मालदेव ओर हिमायूँ भी बच गए। लगभग इसी चाटसु के युद्ध के बाद तय हो चुका था, की अगर मुसलमानो के आतंक से भारत को बचाना है, तो किसी ऐसे मुसलमान को भारत की सत्ता सौंपनी होगी, जो गैर पठान हो। इसके लिए हिमायूँ से बेहतर विकल्प ओर क्या हो सकता था ? हिमायूँ एक थर्ड क्लास आदमी, ओर एक नम्बर का बेवड़ा था । इसके अलावा वह व्यभिचारी भी था, ओर बड़ी बात यह थी, की वह समलैंगिक भी था । ऐसे चरित्रहीन ओर विलासी राजा के सत्ता के केंद्र में रहने से कच्छवाहो का काम इतना आसान हो जाता कि वह पर्दे के पीछे खुद शासन कर सकते थे । गोपाल जी के समय हिमायूँ और कच्छवाहो के बीच मित्रता की चर्चा शुरू हुई थी, कच्छवाहो के पास अपना अभिमान यह था कि उसने हिमायु के सबसे बड़े शत्रु शेरशाह को परास्त किया था, तो यहां पर बराबरी वाली मित्रता की बात थी, ना कि एक दूसरे की कोई अधीनता थी। आमेर नरेश पूरनमल जी के समय ही मुगल ओर आमेर रियासत के बीच मैत्री संधि हो गयी थी।

आमेर ओर मुगलो के बीच संधि अकबर से भी पूर्व अकबर के पिता हिमायु के समय ही हो चुकी थी, जिसकी शुरुआत गोपाल जी के समय मे हुई, ओर पूरणमल जी कच्छवाह के समय दोनो पक्षो की ओर से आधिकारिक संधि की घोषणा भी हो गयी ।

अकबर आमेर संधि ( राजा भारमल का राजतिलक)


आमेर की स्तिथि लगातार बिगड़ती ही जा रही थी। लगातार खराब होती स्थिति को ही संभालने के लिए मात्र 12 दिन पहले राजा बनाये गए राजा राजसिंह कच्छवाह को हटाकर भारमल जी को राजा बनाया गया ।
( जन्म 1491 आमेर जयपुर (राजस्थान भारत) – मृत्यु 27 जनवरी 1574 लाहौर , पाकिस्तान )

राजा भारमल जब राजा बने, तो भारत की राजनीतिक स्तिथि यह थी, की गुजरात मे पठान सुल्तान महमूद मुजफ्फर का शासन था, जो बड़ा ही क्रूर और निर्दयी धर्मान्ध मुसलमान था। दिल्ली की गद्दी पर उस समय शेरशाह सूरी बैठा था, जो स्वयं एक पठान ही था। दिल्ली से जयपुर की दूरी मैदानी इलाकों में ज़्यादा नही है । मेवाड़ में उस समय उदयसिंहः जी का उदय होकर प्रतापजी का भी प्रकाश हो गया था। जैसलमेर में लूणकरण जी, ओर मारवाड़ में मालदेवजी राजा थे।

भारमल को राजा बनाना कम रोमांचक घटना नही है, भारमल को राजा बनाने के लिए पहले राजसिंहजी कच्छवाह को गद्दी से उतारा गया, ओर जब भारमल जी को राजा बनाया गया, तो बादशाह ने अड़चन पैदा कर दी, की आमेर का राजा बनने के योग्य आसकरण जी है । इसपर गोपालजी अड़ गए, ओर उन्होंने कहा की हम सब भाइयो ने मिलकर जो निर्णय ले लिया है, अब उससे पीछे नही हट सकते , अगर आपको आसकरण को राजा बनाना ही है, तो उन्हें नरवर दे दीजिए। इस तरह आसकरण जी को नरवर दिया गया, ओर भारमल आमेर के राजा बने ।

यह नरबर मध्यप्रदेश का किला है, जो आज दयनीय स्तिथि में पहुंच गया है।

आसकरण जी नरवर पहुंचकर हाजी खान पठान को आमेर चढ़ा लाएं, किंतु सारे शत्रु भारमल जी से मिलकर खुद ही शांत हो गए। इस समश्या से तो छुटकारा पाया गया लेकिन आमेर ओर जयपुर रियासत के लिए उस समय बड़ी समश्या ओर थी यहां के लोकल मीणा जनजाति से निपटना । उस समय मीणा लोग बहुत सबल थे, ओर छोटे छोटे राज्यो से बखेड़ा खड़ा करते थे। जयपुर आमेर राज्य को नुकसान पहुंचाने की परंपरा उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ रही थी । यह राज्य को कर देना तो दूर, राज्य की आय का भी भक्षण कर रहे थे। इसके बाद भारमल जी ने बारह कोटड़ी नाम से मजबूत भवन बनाएं, तथा खुद को ओर अपने परिवार को पूरी तरह सुरक्षित किया, ओर अब मीणो के बड़े संकट से निकलने की ठानी ।

भारमल जी ने मीणो के विरुद्ध कठोर नीति नही अपनायी, भारमल जी विलक्षण प्रतिभा के धनी ही थे, इसी कारण पूरा राजपरिवार जैसे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इन्हें राजा बनाने में जुट गया था ।

राजा भारमल युद्धों से घबराने वाले राजा नही थे, आगे चलकर उन्होंने एक से बढ़कर एक युद्ध मे भाग लिया है, ओर शत्रु को कुचलकर रख दिया । लेकिन अपने ही राज्य में गृहयुद्ध नही पनपने दिया । मीणाओ को छोटी छोटी जागीर देकर उन्हें खुद ही अपनी रक्षा का जिम्मा सौंप दिया ।। हाजी खान ले विरुद्ध युद्ध को भी उन्होंने बड़ी आसानी से टाल दिया था। भारमल को कच्छवाह राजवंश का राजपरिवार राजा क्यो बनाना चाहता था, यह भारमल की शुरुआती राजनीतिक सफलताओं से ही पता चल जाता है।

मुगल बादशाह अकबर के राजा बनते ही पठानों ने मुगलो को सत्ता से बेदखल करने की ठान ली । टोंक का हाजी खान पठान जो बड़ा उदंड आदमी था, वह पठानों का नेता बनकर अकबर को कुचलने के लिए आगे बढ़ा, लेकिन भारमल जी ने उसे बीच रास्ते मे ही कुचल दिया, क्यो की वे पठानों के सत्ता में आ जाने का भयानक परिणाम जानते थे।

हाजी खान को कुचल देने की बात से अकबर बड़ा प्रसन्न हुआ, ओर उसने राजा भारमल का बड़ा सम्मान किया, क्यो की अकबर खुद उस समय बड़े राजनीतिक संकट से जूझ रहा था ।

अकबर बड़ा उदंड था, वह जब आमेर आया और मेहमानवाजी के बाद हाथी पर सवार होकर वापस लौटने लगा, तो उसने अपना हाथी मदमस्त तरीके से दौड़ा दिया, उसमे कुछ लोग कुचल कर गंभीर रूप से घायल भी हुए। उस समय वह हाथी आमेर वालो की तरफ भी झपटा, लेकिन आमेर वालो की त्योरी जरा भी नही बदली। यह देखकर अकबर को भारमल जी की कद्र मालूम हुई, ओर कहा ” अगर हम राजा रहे , तो हम आपकी रियासत को भी निहाल कर देंगे ” ।

आसपास के जितने शत्रु थे, उसपर तो राजा भारमल ने नियंत्रण पा लिया था, लेकिन इस समय एक बड़ी परेशानी और खड़ी हो चुकी थी, ओर वह थी मीणा जाति के राजा का दुबारा उपद्रव । इस बार भारमल जी ने मीणाओ पर कौई दया नही दिखाई, ओर अनेक मीणो का वध कर उनके हथियाये गए राज्य को अपने राज्य में मिला लिया ।।

मीणाओ को मारकर राजा भारमल ने नाहन नाम के जिस भव्य शहर पर कब्जा किया ताज किस नाहन के किले 52बुर्ज ओर 56 दरवाजे थे । यहां का राजा बहादुर तो बहुत था, लेकिन प्रजा पर जुल्म ओर अत्याचार भी बहुत करता था । जानवरो के चारा जैसी चीजों पर उसने टैक्स लगा रखा था।

भारमल का राज्य एक सम्रद्ध राज्य था, इस कारण मीणाओ का कच्छवाहो की सीमा पर नागरिकों की लूट खसोट की घटनाएं लगातार बढ़ती ही जा रही थी। राजा भारमल ने इस पूरे शहर को तोड़ फोड़ कर इसको समतल कर दिया ।

इस विषय मे एक कवि का कथन है –

।।बावन कोट छप्पन दरबाजा, जा मीणा मदद नाहन का राजा ।।

भारमल एक तरह से भारत के ही राजा बन चुके थे, अकबर के अव्वल दर्जे का नशेड़ी था, उसे बस अपने भोग विलास से मतलब था, उसके पीछे राजपाठ राजा भारमल ही चला रहे थे ।

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